कमजोर का सहारा
दूध की नदियां
अब कहाँ मिलेगी, निर्मल जल भी मुश्किल है
मिलावट के
जमाने में, शुद्ध दूध का एक धुंट
बच्चे को
मिलना मुश्किल है
छप्पन भोग क्या जाने, जहां
रोटी भी मुश्किल है
फॅशन से रेशमी
कपड़े, और तन ढ़ाकना किसी का मुश्किल है
अम्बर की छतरी सभी, मगर
सिर ढकना छत अपनी से मुश्किल है
आंखे बोलती है सभी की ही, पर
मायने बदल जाते है
धन वर्षा चमक
अमीर आंखो की, जरूरत रोटी गरीब की
आंखे उसकी बया
कर जाती है
सच्ची खुशी
आंखो में दिखना मुश्किल है
कमजोर खुद
भी गिर और रोकर खड़ा हो जाता है
पर हाथ जरा
बढ़ा देने से, हारी हिम्मत बढ़ जाती है
कदम खुद ही
बढ़ाना है पर, तिनके के सहारे से
राह मंजिल की
आसा जरा हो जाती है
बेसहारे को
सहारा मिल पाना इस जमाने में मुश्किल है
सूरज सा कोई
सितारा, रोशन करता राह मुसाफिर की
कदम सच्चाई की
राह मेँ, मंजिल कुछ ऊंचाई पर हो
इंसान अपने
उच्च आचरण से, ऋषि- मुनि बने बहुत है
जरूरत पर काम
आकर वो भगवान भी किसी के हो गए ***सौण
परी ***
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